कोरोना : हीरालाल मिश्र मधुकर

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मानवता को पीड़ा देकर क्या होगा उपलब्ध कोरोना
बढ़ा तेरा आतंक सृष्टि के सृजक भी स्तब्ध कोरोना।

भारत की सभ्यता- संस्कृतिआदिकाल से न्यारी है,
भस्मासुर भी भस्म हो गया ऐसी शक्ति हमारी है।
महामृत्युंजय मंत्र हारती जिससे मृत्यु हमेशा है ,
तड़प -तड़प कर रक्तबीज को मरते जग ने देखा है ।

मिट जाएगा जड़ से तू भी ,यही तेरा प्रारब्ध कोरोना,
मानवता को पीड़ा देकर क्या होगा उपलब्ध कोरोना।

भारत का सौहार्द्र न टिकने देगा कभी महामारी,
चेचक-प्लेग मिटे जैसे, अब मिटने की तेरी बारी ।
नहीं अग्नि में जलने का जिसको वर था वह जला यहाँ, दया -धर्म की भूमि,दुष्ट नरभक्षी है कब पला यहाँ।

प्रबुध बुद्ध की धरा यहाँ होगा समूल निस्तब्ध कोरोना, मानवता को पीड़ा देकर क्या होगा उपलब्ध कोरोना।

हीरालाल मिश्र मधुकर
(वरिष्ठ रचनाकार)
वाराणसी, उत्तर प्रदेश

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